लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले




शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ ( 1788- 1854) का नाम शेर और शायरी की दुनिया में सम्मान के साथ लिया जाता है. मुग़ल सलतनत के बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) के दौर में, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ को मलक-उश-शोअरा के ख़िताब से नवाजा गया था । सोचिए वह कितना साहित्यिक समय रहा होगा ,बादशाह ज़फ़र भी शायर और उनके दोस्त भी शायर । 

जौक साहब की  गिनती उस समय के प्रसिद्ध शायरों, ग़ालिब और मोमिन से बड़े शायरों में होती थी लेकिन समय बदलता गया और लोग उन्हे भूलते गए और अदब की दुनिया मे ग़ालिब का नाम मशहूर हो गया । खैर यह कोई  नई बात नहीं है , आज भी ऐसा ही होता है । 

एक दिन आप लोग भी मुझे भूल जाएंगे .. याद किसे रखेंगे यह तो मुझे भी पता नहीं ।  खैर छोड़िए जौक साहब की बात करते करते कहाँ मैं अपना किस्सा ले बैठा , कहाँ वे मशहूर शायर और कहाँ मैं एक अदना सा कवि । 


चलिए कुछ जौक साहब के बारे मे जानने की कोशिश करते हैं 

जौक के पिता रमजान साहब मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश से दिल्ली आए थे । वे कहानियाँ लिखते थे और नौकरी ढूंढते थे , उन्हें नौकरी तो नहीं मिली लेकिन दिल्ली के एक नवाब ने अपने हरम का प्रधान नियुक्त कर दिया ।  हालांकि यह भी एक तरह की नौकरी ही थी ।  वे दिल्ली मे काबुली दरवाजा नामक जगह पर रहने लगे ।  यह वह जगह थी जहाँ  उन दिनों शहर के अमीर लोग रहा करते  थे । आपको पता नहीं होगा कि 1857 के गदर के बाद इस इलाके के मकान ढहा दिए गए थे । बाद मे यहाँ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन बना

चलिए यह सब पढ़कर क्या करेंगे आइए जौक साहब के कुछ प्रसिद्ध शेर देखते हैं और उनका विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं । ज़िंदगी यानी हयात  और कज़ा यानी मौत के बारे मे उनका एक शेर है  


लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले


यह दर्शन का शेर है मतलब जब मौत आएगी तो हमको उसके साथ जाना होगा क्योंकि इस दुनिया में हम न  अपनी खुशी से आए हैं न अपनी खुशी से जाएंगे।  चाहते तो जौक साहब खुदा को क्रेडिट दे सकते थे लेकिन उन्होंने नहीं दिया । 

उनका एक शेर और मशहूर है


अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

यह शेर मनुष्य को संघर्ष करने की प्रेरणा देता है मतलब आपको इसी दुनिया मे सुख चैन  हासिल करना है , घबराना नहीं है , सुख दुख आते रहेंगे । 

कुछ शेर तो उन्होंने ऐसे लिखे जैसे कोई नौसीखिया  लिखता है 

तू भला है तो बुरा हो नहीं सकता ऐ 'ज़ौक़'
है बुरा वो ही कि जो तुझ को बुरा जानता है


और अगर तू ही बुरा है तो वो सच कहता है
क्यूँ बुरा कहने से तू उस के बुरा मानता है

लेकिन इस शेर मे गहरा अर्थ है 

तू भला है तो बुरा हो नहीं सकता ऐ 'ज़ौक़'
है बुरा वो ही कि जो तुझ को बुरा जानता है

मतलब ,तू एक ही अर्थ मे ही रह सकता है या तो अच्छा होगा या बुरा होगा ,एक समय मे दो तरह के व्यक्तित्व नहीं हो सकते ,लेकिन अगर तू अच्छा है तो फिर बुरा कौन हुआ ? यहाँ बुरा वह है जो तुझे अच्छा होने के बावजूद बुरा समझता है । 

अब यह शेर देखिए 

और अगर तू ही बुरा है तो वो सच कहता है
क्यूँ बुरा कहने से तू उस के बुरा मानता है

और अगर तू बुरा है सचमुच , या अपने आप को बुरा समझता है या स्वीकार करता है तो फिर यदि कोई तुझे बुरा कहता है तो उसकी बात का बुरा क्यों मानता है वह तो पहले भी सच कह रहा था और अब भी सच कह रहा है 

इन दोनों शेरों का अर्थ यही हुआ कि मनुष्य को यह खुद तय  करना होता है कि वह अच्छा है या बुरा ।  किसी के कहने से कोई फरक नहीं पड़ता । 

यह विश्लेषण आपको कैसा लगा कमेन्ट मे अवश्य बताएं 

आपका 

शरद कोकास 

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