लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले




शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ ( 1788- 1854) का नाम शेर और शायरी की दुनिया में सम्मान के साथ लिया जाता है. मुग़ल सलतनत के बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर में, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ को मलक-उश-शोअरा के ख़िताब से नवाजा गया था । उस समय उनकी गिनती प्रसिद्ध शायरों, ग़ालिब और मोमिन से बड़े शायरों में होती थी लेकिन समय बदलता गया और लोग उन्हे भूलते गए और अदब की दुनिया मे ग़ालिब का नाम हो गया ।


जौक के पिता रमजान साहब मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश के लिए आए थे वे कहानियाँ लिखते थे उन्हें नौकरी तो नहीं मिली लेकिन दिल्ली के एक नवाब ने अपने हरम का प्रधान नियुक्त कर दिया वे दिल्ली मे काबुली दरवाजा नामक जगह पर रहते थे यह उन दिनों शहर के अमीर लोग रहते थे 1857 के गदर के बाद इस इलाके के मकान ढहा दिए गए थे बाद मे यहाँ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन बना

आइए जौक साहब के कुछ प्रसिद्ध शेर देखते हैं 


लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले


यह दर्शन का शेर है मतलब जब मौत आएगी तो हमको उसके साथ जाना होगा क्योंकि इस दुनिया में हमें अपनी खुशी से आए हैं मैं अपनी खुशी से जाएंगे

उनका एक शेर और मशहूर है


अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

यह शेर मनुष्य को संघर्ष करने की प्रेरणा देता है मतलब आपको इसी दुनिया मे सुख चैन  हासिल करना है , घबराना नहीं है , सुख दुख आते रहेंगे । 

कुछ शेर तो उन्होंने ऐसे लिखे जैसे कोई नौसीखिया  लिखता है 

तू भला है तो बुरा हो नहीं सकता ऐ 'ज़ौक़'
है बुरा वो ही कि जो तुझ को बुरा जानता है


और अगर तू ही बुरा है तो वो सच कहता है
क्यूँ बुरा कहने से तू उस के बुरा मानता है

लेकिन इस शेर मे गहरा अर्थ है 

तू भला है तो बुरा हो नहीं सकता ऐ 'ज़ौक़'
है बुरा वो ही कि जो तुझ को बुरा जानता है

मतलब तू एक ही अर्थ मे ही रह सकता है या तो अच्छा होगा या बुरा होगा ,एक समय मे दो तरह के व्यक्तित्व नहीं हो सकते ,लेकिन अगर तू अच्छा है तो फिर बुरा कौन हुआ ? यहाँ बुरा वह है जो तुझे अच्छा होने के बावजूद बुरा समझता है । 

अब यह शेर देखिए 

और अगर तू ही बुरा है तो वो सच कहता है
क्यूँ बुरा कहने से तू उस के बुरा मानता है

और अगर तू बुरा है सचमुच , या अपने आप को बुरा समझता है तो फिर यदि कोई तुझे बुरा कहता है तो उसकी बात का बुरा क्यों मानता है वह तो पहले भी सच कह रहा था और अब भी सच कह रहा है 
इन दोनों शेरों का अर्थ यही हुआ कि मनुष्य को यह खुद तय  करना होता है कि वह अच्छा है या बुरा ।  किसी के कहने से कोई फरक नहीं पड़ता । 

यह विश्लेषण आपको कैसा लगा कमेन्ट मे अवश्य बताएं 

आपका 

शरद कोकास 




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