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शकील बदायूँनी साहब की पुण्यतिथि पर

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शकील बदायूँनी की पुण्यतिथि २० अप्रेल पर उनकी एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ | सत्तर अस्सी के दशक मे यह ग़ज़ल बहुत लोकप्रिय थी , हालांकि इसे बहुत उच्च कोटि की रचना नहीं माना जाता था लेकिन आशिक माशूक के इस  तरह के कलाम बहुत चला करते थे जिनमे कफन, दफन, जनाजा जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था । इस ग़ज़ल को मैंने कुछ इस तरह भी सुना था .. संगदिल आ भी जा इतना संगदिल ना बन ज़िंदगी की है शाम आखिरी आखिरी .. बहरहाल इसका सही वर्षन पढ़िए   आख़िरी वक़्त है आख़िरी साँस है ज़िंदगी की है शाम आख़िरी आख़िरी संग-दिल आ भी जा अब ख़ुदा के लिए लब पे है तेरा नाम आख़िरी आख़िरी कुछ तो आसान होगा अदम का सफ़र उन से कहना तुम्हें ढूँढती है नज़र नामा-बर तू ख़ुदारा न अब देर कर दे दे उन को पयाम आख़िरी आख़िरी तौबा करता हूँ कल से पियूँगा नहीं मय-कशी के सहारे जियूँगा नहीं मेरी तौबा से पहले मगर साक़िया सिर्फ़ दे एक जाम आख़िरी आख़िरी मुझ को यारों ने नहला के कफ़ना दिया दो घड़ी भी न बीती कि दफ़ना दिया कौन करता है ग़म टूटते ही ये दम कर दिया इंतिज़ाम आख़िरी आख़िरी जीते-जी क़द्र मेरी किसी ने न की ज़िंदगी भी मिरी बेवफ़ा हो गई...

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे

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फैज़ का यह मशहूर इंकलाबी कलाम है , जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में है , और दुनिया के हर संघर्षशील आदमी के पक्ष में है ।   फ़ैज़ की एक नज़्म   जन्म शताब्दी पर विशेष रूप से प्रस्तुत बोल के लब आज़ाद हैं तेरे बोल के लब आज़ाद हैं तेरे बोल ज़बाँ अब एक है तेरी तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा बोल: के जाँ अब तक   तेरी है देख के: आहंगर दुकाँ में तुंद हैं शोले , सुर्ख़ है आहन खुलने लगे कुफ़लों के दहाने फैला हर एक ज़न्जीर का दामन बोल, ये: थोड़ा वक़्त बहुत है जिस्म- ओ –ज़बाँ की मौत से पहले बोल, के:सच ज़िन्दा है अब तक बोल , जो कुछ कहना है कहले सुतवाँ =सुडौल ,आहंगर =लोहार , तुंद=तेज़ आहन =लोहा , कुफ़लों के दहाने =तालों के मुख ,  ( साभार - फैज़ अहमद फैज़ की प्रतिनिधि कवितायें - राजकमल पेपरबैक्स ) 

न होता मैं तो क्या होता

आज प्रस्तुत है ग़ालिब साहब की यह गज़ल जो मुझे बेहद पसंद है  न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता  डुबोया मुझको    होने  ने  , न होता मैं तो क्या होता  हुआ जब ग़म से यों बेहिस, तो ग़म क्या सर के कटने का  न  होता  ग़र  जुदा  तन  से  ,  तो  जानू  पर  धरा  होता   हुई  मुद्दत  कि   ग़ालिब मर गया  ,पर  याद  आता  है  वह हर एक बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता                                           सही है हम हैं इसलिये दुनिया की ये खुशियाँ है , ये ग़म हैं , ये परेशानियाँ हैं ,अगर हम पैदा ही नहीं होते तो हमारे लिये तो ये सब कुछ नहीं होता ।

कोई मेरे दिल से पूछे , तिरे तीर-ए-नीमकश को

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अंसार अहमद मेरे मित्र हैं , शायरी का शौक इस तरह कि ढेरों शेर ज़बानी याद । कहने का शौक तो नहीं है लेकिन मोबाइल पर एस एम एस कर भेजते रहते हैं । बाज़दफा चर्चा भी होता है मशहूर शाइरों के बारे मे ,उनकी शायरी के बारे में । अंसार अहमद बैंक में अफसर हैं सो अपने क्षेत्र की जानकारी तो है ही । यह मेरी सलाह थी आइये ब्लॉग जगत में प्रवेश कीजिये और अपने ज्ञान को दुनिया से शेयर कीजिये . सो कूद गये हैं । अब सम्भालना आपके ज़िम्मे है । आगे जैसे जैसे वे इस दुनिया से परिचित होंगे आप भी उनकी शख्सियत से परिचित होते जायेंगे । फिलहाल तो उन्होने मुझ पर यह ज़िम्मेदारी सौंपी है कि मै यहाँ कुछ लिखूँ और इस ब्लॉग को आगे बढ़ाऊँ सो आज की यह मेरी पहली पोस्ट । अंसार अहमद ने शुरुआत ग़ालिब से की है तो मैं भी ग़ालिब का एक शेर लेकर आया हूँ । गालिब साहब के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है लेकिन एक बात मैं कहना चाहता हूँ गालिब की लोकप्रियता को लेकर । शुरुआती दौर में जब ग़ालिब साहब ने शेर कहे तो वे अरबी,फारसी से बोझिल थे वे शेर उनके पॉपुलर नहीं हुए । लोकप्रिय वे शेर हुए जो सरल थे । यह चर्चा का विषय तो है लेकिन इस पर बाद में बात करे...

मेरा पहला दिन

ब्लॉगिंग की दुनिया में प्रवेश कर रहा हूँ ग़ालिब के इस शेर के साथ है और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़े बयाँ और आप सभी को मेरा अभिवादन - अंसार अहमद