जाँ निसार अख़्तर - अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं


वे  स्कूल के दिन थे । किशोरावस्था मे जैसे सब बच्चे फिल्मी गानों पर मुग्ध रहते थे मैं भी रहता था कि अचानक एक दिन मुकेश की आवाज़  में यह ग़ज़ल सुनी और मेरे भीतर गज़लों का शौक जाग गया , जगजीत सिंह तो उसके बाद आए लेकिन मुकेश और जां निसार अख्तर पहले आ गए  । इस ग़ज़ल मे कुछ ऐसे शेर थे जिनमे एक अलग सा दर्शन था  । जानते हैं वह ग़ज़ल कौनसी है 

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

लेकिन लाल अक्षरों में नीचे दिए गए यू ट्यूब के लिंक से ग़ज़ल सुनने और पढ़ने से पहले  यह कुछ बातें इस ग़ज़ल के बारे मे पढ़ लीजिए 

जाँ निसार अख्तर की मुकेश द्वारा गाई यह ग़ज़ल मुख्य रूप से 1970 और 1971 के आसपास रिकॉर्ड की गई थी। यह वह दौर था जब मुकेश अपनी 'गैर-फिल्मी' ग़ज़लों के लिए भी बहुत लोकप्रिय हो रहे थे।

अल्बम: इसे बाद में एचएमवी (HMV) द्वारा जारी किए गए कई प्रसिद्ध संकलनों जैसे "The Golden Collection" और "Best of Mukesh Ghazals" में शामिल किया गया।

संगीतकार: इस ग़ज़ल की धुन उस दौर के मशहूर संगीतकार खैयाम द्वारा तैयार की गई थी क्योंकि यह एक व्यक्तिगत रिकॉर्डिंग (NFS - Non-Film Song) थी।

मुकेश और जाँ निसार अख़्तर: मुकेश ने शायर जाँ निसार अख़्तर की कई ग़ज़लें गाईं, जिनमें से यह रचना सबसे लोकप्रिय हुई। जाँ निसार अख़्तर का निधन 19 अगस्त 1976 को हुआ था, और मुकेश का भी उसी वर्ष 27 अगस्त 1976 को, इसलिए यह उनकी आखिरी सफल गैर-फिल्मी रिकॉर्डिंग्स में से एक मानी जाती है । 

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

और यह शेर जिसने मुझे स्त्री देह का सम्मान करना सिखाया 

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं


आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

मुकेश ने आखिरी का यह शेर नहीं गाया था , रिकार्ड मे केवल चार शेर हैं 


मुकेश द्वारा गाई इस गजल को आप यू ट्यूब के इस लिंक से सुन सकते हैं

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